Sunday, September 22, 2013

बंदिश

जब आ ही गयी हो ख्वाबों में, लबों पे बंदिश क्यों है
जो सुर्ख हैं मिजाज आपके, छुपाती कशिश क्यों है



तुम

बाद बरस ये रात आयी है, जैसे सपनो से जाग, फिर नींद आयी है
कहने को तो हम जागते रहे हैं, फिर अब क्यों याद, वो बात आयी है

जागती आँखों से देखे सपने तो याद हैं, वो चेहरा, शायद नींद में देखा होगा
धुंधलके में चमकता वो सितारा, ना, शायद चाँद उतर आया होगा

जो खनकने की आवाज गूंज रही है, अभी भी, ये लरियाँ कुछ तो कहेंगी
तेरी जिस खूशबू ने बाँध रखा है, आज, जान मेरी ले के रहेंगी ।


बदल गए

बदलते समय के साथ हम भी बदल गए,
क्यूँ करके भी हमें याद नहीं आतें वो पल,
शायद हमारे साथ वो भी बदल गए 

साथी

फिर क्यों ना करे ये मन, आस किसी साथी की
जिसके सपने लगे अपने, और बातें मन की । 

यादें

अनदेखी राहों से आती हैं, न जाने कब घर कर जाती हैं
यादें जब आती हैं, पलकों पे दो बूँद छोर जाती हैं ।